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Saturday, September 25, 2010
समझ से दूर
समझ से दूरजिधर जाओ जिससे मिलो चारो तरफ राम जन्म भूमि अयोध्या की चर्चा खैर इस बार उतने उन्मादी गर्म जोशी के साथ नही धिरे–धिरे ही बातें हो रही है। मै अपने आस-पास मिलने झुलने वालो से जो दोनो महजब से ताल्लुक रखते हैं जिससे भी मिला इस विष्य पर बात चित हुई सभी लोगो का कहना एक ही था, मंन्दिर वने या मस्जिद हमे क्या फर्क पड़ता है। हम तो भाई कोर्ट के आदेश का ईंन्तेजार कर रहे हैं, और कोर्ट के आदेश को मानना चाहिए । मेरा मानना है कि इस प्रकार कोर्ट के उपर दवाब बना कर याचिकाएँ दायर कर के कोर्ट को उलझाना इससे जनता मे एक गलत संदेश ही जायेगा ऐसे ही हाल ही मे कोर्ट की विश्वनियता पर ऊँगुली उठ चुकि है। देखा जाए तो दोनो ही कौमो के लोग का कहना है कि इस बार कोर्ट को अपना फैसला सुना देना चाहिए चाहे न्याय किसी भी पक्ष मे जाए, बस अब बहुत हो चूका इस मुद्दे को अब यही पर समाप्त कर देना चाहिए। परन्तु क्या ऐसा हो पायेगा। हम अपने देश के संम्पूर्ण नेताओ की संख्या को जोड़े तो मेरे हिसाब से यह संख्या लगभग एक लाख के आस पास की होगी ,वर्तमान समय मे हमारे देश की कुल आबादी एक अरब से अधिक की होगी । जरा सोचिए इतनी बड़ी आबादी को इतने कम संख्या के लोग आपस मे लड़ा कर अपना स्वार्थ सिध्द कर लेते हैं। यदि यह मुद्दा समाप्त कर दिया जाए तो इससे बड़ा और ज्वलंन्त मुद्दा पार्टीयों को जल्दी नही मिल पाएगा,साथ ही साथ इस ज्वलन्त मुद्दे को समाप्त करने का श्रेय लेकर अपने आप को जन हितैषी होने का संदेश जनता तक पहुँचाना चाहेगी, जिससे आने वाले चुनावों मे अपने सफलतों और उपल्वधियों के झंन्डे गाड़ सके ।
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