समाज मे अधिक्तर लोगों की मानसिकता दूसरो की बात सुनने के अपेक्षा अपनी बात कहने की तत्परता अधिक होती है लोगो मे एक और बड़ी ही विचित्र आदत होती है कि उनसे यदी कोई कार्य करने को कहा जाए तो उस बात को गंम्भीरता से नही लेते या वे उस बात को अनसुना कर देते हैं, या जैसे-तैसे जल्दी-जल्दी काम को अधूरे मन से कार्य की इतिश्रि कर लेते हैं ऐसे लोगो की संख्या ज्यादा तर कम पढ़े लिखे वर्गो की है, परन्तु कुछ पढ़े लिखे लोग भी इसमे शामिल है,अनपढ़ लोग और पढ़े लिखे दोनो प्रकार के लोगों मे यह प्रवर्ति एक ही जैसी होती है, बह प्रवर्ति है वर्चस्व की । अनपढ़ व्यक्ति यह सोचता है कि समाज मेरी खिल्ली न उड़ाये और मुझे ऐसा समझा जाये की हम भी बहुत पढ़े लिखे हैं और काबिल व्यक्ति हैं, हम किसी से कम नही । पढ़ा लिखा व्यक्ति यह सोचता है कि समाज मेरा यह समझ कर खिल्ली न उड़ाये कि यह देखो पढ़े लिखे व्यक्ति को काला अक्षर भैंस बराबर । दोनो ही अवस्थाएँ एक जैसी हैं, लेकिन परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं । यह दोनो ही प्रवर्तियाँ मनुष्य की शत्रु हैं । इसी प्रवर्ती का मनुष्य के व्यक्तित्व विकास मे एक महत्वपूर्ण स्थान हैं । यदि एक अनपढ़ व्यक्ति इस विष्य में न सोच पाये तो यह एक अलग बात होगी परन्तु एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अगर न सोचे तो यह बास्तव मे यह काला अक्षर भैंस बराबर ही होगा ।
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Wednesday, October 20, 2010
व्यक्तित्व विकास ।
दिनांक - 20/10/2010
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