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Monday, December 6, 2010

संस्कृति से संस्कार तक ।


संस्कृति से संस्कार तक
दिनांक – 6 दिसम्बर 2010
हमारे देश की संस्कृति दुनियाँ की सबसे प्राचीनतम् संस्कृतिओ मे से एक है । हिन्दु सांस्कृति मे कोई मनुष्य जब मर जाता है, तो उसके शरीर को जलाया जाता है, वही मुसलिम, ईसाई लोग शरीर को दफनाते हैं । बहुत से समुदायों मे मृत्यु के पश्चात् शरीर को पानी में वहा दिया जाता हैं । इन सभी क्रियाओं का मूल उद्देश्य एक ही है, और उसके पिछे वैझानिक आधार और कारण है । यह सभी को पता है, कि हमारा शरिर मूलतः पाँच तत्वों से बना है। तुलसी दास जी ने अपने चौपई मे लिखा हैः- क्षिती, जल, पावक, गगन, समीरा। पंच तत्व प्रभु रचित अधम सरीरा।। 1- क्षिती। ( भूमि या मीट्टी  ) 2- जल। ( जल रक्त मे होता है।) 3- पावक। ( वायु (हवा) पेट मे होता है।) 4- गगन। ( आकाश ह्रदय मे होता है।)  5- अग्नि  (आग पित्त होता है।) ये सभी तत्व मनुष्य के शरिर मे भी मौजूद है । इन पाँचों तत्वों का अपना एक निश्चित् स्थान हैं । जो पाँचों तत्व मनुष्य शरिर होता है, ( इसीलिए किसी की मृत्यु होने जाने पर यह लोगो को कहते हुए आपने  सुना होगा कि अमुक व्यक्ति कहाँ गये,अरे भाई वह तो पंच तत्व मे विलीन हो गये।) वही तत्व पृथ्वी मे भी हैं। हमारे इस मिट्टी से पैदा होने वाले सभी तरह के अन्न, साग,सब्जिओ मे ये सभी तत्व मौजूद हैं। आयरन,कैल्सियम तथा अन्य मिनरलस पानी मे भी हैं । पानी मे पया जाने वाला तत्व आयरन की मानव शरिर मे महत्वपूर्ण भूमिका हैं। मानव शरिर में तिन ग्राम आयरन होता हैं। यदि ये तिन ग्राम आयरन शरिर से बाहर निकल जाए तो मनुष्य मर जायेगा । इसी प्रकार अन्य तत्वों की भी अपनी-अपनी भूमिकाएँ हैं । मृत शरिर को दफनाने का कारण यह है, कि इन तत्वों के पैदा होने वाले स्थान मे हम इन तत्वों को फिर से मिला देते हैं । शरीर को जलाने का कारण यह है, कि शरीर के ये सभी तत्व आग मे जल कर गैस मे बदल जाती है, विज्ञान के नियमानुसार गैस वायु से हल्की होती है अतः वह ऊपर की ओर भागती हैं और वायु मंण्डल मे फैल कर बादलों मे मिल कर तापमान कम होने पर धरती पर वर्षा के रुप मे गिरती है । खनिज लवण वर्षा के पानी मे घुल कर अन्न की सिंचाई करते हैं। इस तरह वर्षा के पानी से धरती और पेड़-पौधे फिर से यही तत्व प्रात्त करते हैं । मृत शरीर को जब पानी मे प्रवाहित किया जाता हैं तब ये सभी तत्व पानी मे घुल जाते हैं किसी न किसी रुप मे यह सारे तत्व पुनः मानव शरिर मे आ जते हैं । इस प्रकार प्रकृती और मानव जिवन चक्र चलता रहता है, प्राणी का प्रकृती से बहुत घनिष्ट संम्बन्ध है। मनुष्य इसी धरती पर पैदा होता है। इसी धरती के सभी संसाधनो का ऊपयोग करता है, फिर एक मनुष्य दुसरे से अलग कहाँ, अन्तर तो केवल मनुष्य के सोच मे है। हर आदमी का एक जैसा खून का रंग और एक हांढ़-मांस का शरिर है। परन्तु सबकी अलग-अलग पहचान होती है। लड़ाई आज की है, वर्तमान की है, लड़ाई भूत मे रहे चाहे न रहे। भविष्य मे हो चाहे न हो।

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