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Thursday, December 9, 2010

भ्रष्टाचार पूरे सिस्टम मे फैल चुका है।

आदरनीय शशि शेखर जी नमस्ते ,
दिनांक – 5 दिसम्बर
रविवासरीय हिन्दुस्तान दिनांक -5 दिसम्बर 2010 का मंथन पृष्ट पर छपा आपका लेख ‘ भ्रष्टाचार के अंधेरे में उम्मीद मत छोड़िए’ पढ़ा अच्छा लगा । लेख के शुरुआत मे आपने दो प्रशन किये हैं 1- भारत में भ्रष्टाचार की जड़े इतने गहरे पैठ गई है कि अब उनसे पार पाना नामुमकिन हो गया है? 2- क्या इसके लिए सिर्फ राजनेता , गठबंधन की राजनीति और लोलुप नौकरशाहों का गिरोह ही दोषी हैं? पहले प्रशन के संर्दभ मे कहना यह है कि मै अपने बच्पन से भ्रष्टाचार की बाते सुनता आ रहा हूँ। इस समय मेरी उम्र 48 बर्ष की है और 20 बर्ष के आयु से सामाजिक जिवन निर्वाह कर रहा हूँ। आज से 28 बर्ष पूर्व मै अपने किसी काम से एक अधिकारी के पास एक प्रार्थना पत्र ले कर गया हुआ था। संक्षेप मे बता रहा हूँ, उन्होने बिना घुस के काम करने से मना कर दिया। इसमे कोई संदेह नही कि नौकरशाहों तक भ्रष्टाचार पहुँचते- पहुँचते बर्षो लगे होगेँ। आपको यह बताना निर्थक होगा कि भ्रष्टाचार ऊपर से शुरु हो कर निचे तक आता है। इसका मतलब यह है कि भ्रष्टाचार की निव मैरे बच्पन के जमाने से या उससे पहले ही पड़ चूकि थी यह अलग बात है कि उस समय भ्रष्टाचारीयो की संख्या कम रही होगी साथ ही साथ हमारे देश का सूचना तंत्र भी इतना मजबूत नही था जिस बजह से उस समय मे हुए भ्रष्टाचार सामने नही आये। अभी-अभी हमने देश स्वत्रंत्त्ता की वासठबी बर्षगांठ मनाया, कहीं ऐसा तो नही देश के आजादी के साथ ही भ्रष्टाचारी की निव पड़ चुकी थी। आज इतने सालो बाद भ्रष्टाचार इस स्तर पर पहुँचा । आज भ्रष्टाचार पुरे सिस्टम मे फैल कर भ्रष्ट चूका है। मुझे तो यह लगता है कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक बार फिर से देश को क्रांती का साहारा लेना पड़ेगा। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी हर काल मे रहे चाहे बह राम-राबण का युग ही क्यो न हो परन्तु कम से कम उस युग मे भ्रष्टाचारीओ की संख्या कम थी साथ ही साथ बह युग आज के युग की तरह इतना विकसीत नही था, और न ही नियम कानून संविधान था। अब बात आती है नेताओ की आज तक हमारे देश मे जितने भी नेत बने ज्यादातर वे अनपढ़ या कम पढ़े लिखे ही लोग होते है, या समाज के उन दबे कुचले या असामाजिक बर्गो के लोग हैं। जो पद ग्रहण करते ही भ्रष्टाचार करने के फिराक मे रहते हैं। आर्दश और संस्कार तो उनके पास होता ही नही है। ऐसे लोगो से स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। उम्मीद की कीरण तो बहीं दिखाई देती है जब रात खत्म हो सुबह का आगमन होने को होता है। याँहा तो काली अंधेरी रात है ।

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