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Sunday, February 27, 2011

एक के बाद एक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी

एक के बाद एक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी
दिनांक -दिनांक – 27/2/2011
 विदेशी बैंको मे जमा धन के मुद्दे पर अभी तक हम सभी ने बहुत कुछ लिखा पढ़ा और सुना अब विदेश मे जमा काले धन की स्वदेश वापसी मुद्दे पर हमारी सरकार गंभीर नही दिखाई पड़ रही है। बहुत दिनो तक इस पर होहल्ला चला अब इस मुद्दे पर से सभी लोगों का ध्यान हट गया, या धीरे-धीरे देर सवेर हट जाएगा सबके-सब एकदम खामोश और अब शुरु हुआ, अपने ही देश मे बैठे अरुण मिश्रा जैसे UP SIDC के चीफ इंजीनियर स्तर के एक कर्मचारी ने अकूत धन बैंको के वेनामी खातों मे और अनेको अचल संपत्तियां  इकट्ठा होने के मुद्दे ने जोर पकड़ लिया है। इसकी जानकारी अभी CBI द्वारा उनके घर से लेकर कार्यालय पर मारे गये छापे से यह मालूम हुआ कि मनी लाँण्ड्रिंग के मामले के  रहस्य पर से पर्दा उठते-उठते एक अरब रुपए  के घोटाले होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। बहुत मात्रा मे धन, चल-अचल संपत्तियां अरुण मिश्रा ही नही ऐसे अनेको भ्रष्टाचारियों के लाकरों से लेकर उनके कब्जे मे फँस कर सड़ रहे होंगे। इस तरह हमारी अर्थव्यवस्था का सफेद धन, काले धन मे बदल कर हमारे अर्थ व्यावस्था से बाहर हो गया। जिसका प्रभाव परोक्ष-अपरोक्ष रुप से बाजार भाव से लेकर आर्थिक गती विधीयों मे पड़ना तय है। हमारे देश की गरीब जनता कठोर मेहनत करने के बावजूद और गरीब होता जा रहा है, धनी और धनी। इस पर भी हमारे देश की पार्टीयाँ और सरकार आर्थिक संपन्नता की बात करती है आर्थीक संपन्नता के मामले मे हमारे देश की गरीब जनता आर्थिक संपन्न भले ही न हुए हो भ्रष्टाचारी जनता जरुर आर्थिक संपन्न हो गये हैँ और हमारी सरकार कागजों मे ऐसे जनता की संपन्नता का आकड़ा दे कर हमारे देश की आर्थीक तरक्की की बात बड़े गर्व के अपने पार्टी की उपल्बधीयों का वखान समाचार पत्रो से लेकर दुर्दशन पर समय- समय करती रहती है। हमारे देश मे आर्थिक संपनता और समानता तभी आ सकती है जब पार्टीयां और सरकार वास्तव मे गरीब जनता के उत्थान और संपनता के लिए ईमानदारी से नही सोचेगी। यदि हमारे देश मे भ्रष्टाचार पर सर्वेक्षण कराया जाए तो देश की कुल आबादी के 25 से 30 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार मे लिप्त पाये जाएगें। भले ही छोटा आदमी छोटा भ्रष्टाचार बड़ा आदमी बड़ा भ्रष्टाचार इन सभी भ्रष्टाचारीयों का काला धन वटोर कर देश के गरीब जनता मे समान रुप से बांट दिया जाना चाहिए। क्यों कि यह उन्ही लोगो का और हमारे देश की जनता का ही धन है और इस धन की कमी की बजह से न जाने कितने गरीबों को कफ़न तक से वंचित रहना पड़ा होगा।

Wednesday, January 12, 2011

आरक्षण से क्षमा

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आरक्षण  से  क्षमा
दिनांक – 11/01/2011
     *       भारत और  पाकिस्तान  के मध्य बंटवारे पर जब-जब सेमिनार हुए तब-तब यह देखा गया कि उस पर पानी फेरने के लिए मुस्लिम प्रवक्ताओं को बार- बार यह कहते हुए सुना गया है कि यह सब कुछ तो प्रतिष्ठित  मुसलमानों की कारस्तानी थी, साधारण मुस्लिम जनता का इससे कोई लेना देना नहीं था  इसे मानना पड़ता है और हम मान भी लेते हैं  चलिए  उसे छोड़ देते हैं, लेकिन यदि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की  मांग करने वालों की हैसियत को देखा जाए, तो फिर वही मंज़र याद आ जाता है कि सब के सब कुलीन वर्ग के ही लोग हैं। कम से कम  ये वे लोग तो नहीं हैं जिन्हें लाभ मिलना चाहिए। ऐसी दशा में फिर से कोई ऐसी गलती फिर से दुहरायी न जाये कि उनकी रपटों को लागू करके एक और बंटवारे का मार्ग को खोल दिया जाय। देश व राष्ट्रीय एकता को अक्षुण   रखने की गरज से उन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए  एक बात ध्यान देने योग्य है कि इससे केवल  प्रतिष्ठित मुसलमानों की राजनीतिक कुचेष्टाओं को ही क्षति पंहुचेगी और कथित लाभार्थी व साधारण मुस्लिम जनता को इससे कोई भी फर्क नही पड़ेगा 
   इसका पहला कारण तो यह कि मुस्लिम  कुलीन वर्ग उन लाभों को साधारण मुस्लिम जनता  तक पहुँचने ही नही देंगे। जैसा कि हिन्दू दलितों के आरक्षण के साथ हुआ। इसलिए कि आरक्षण की मांग उनकी है ही नहीं। और न ही इसके लिए उन्होंने  कोई संघर्ष कियाया करने की ज़रुरत भी नहीं थी, क्योंकि वे गरीब भले रहे हों पर दमन के शिकार नहीं थे उन्हें अपनी धार्मिक व्यवस्था से कोई शिकायत  नहीं  है, और उससे उन्हें कोई परेशानी नहीं है फिर वे दलित कैसे कहे जाएँ और क्यों। यहीं पर यह  ध्यान देने की जरूरत है कि हिन्दू दलितों को आरक्षण उनके आर्थिक उत्थान के लिए नहीं, बल्कि उनके सामाजिक  सम्मान और उत्थान के  लिए है , दरअसल इसी सम्मान व उत्थान के लिए ही लडाई  है। ऐसा वे स्वयं समझते और कहते हैं। यदि ऐसा नहीं है तो आर्थिक दशा अच्छी हो जाने के बाद भी बड़े बड़े दलित अधिकारी वर्ग आरक्षण मुद्दा छोड़ चुके होते।
   सामाजिक प्रतिष्टा  को हासिल करने  के लिए क्या क्या  करना पड़ा, इसकी शुरूआत यदि अंबेडकर युग  से करें तो उन्होंने इसके लिए क्या-क्या  पापड़ नहीं बेले, क्या क्या नहीं किया। हिन्दू धर्म  की व्याख्या  करते हुए उसकी  बखिया तक उधेड़ डालीं, उसका तार तार, रेशा रेशा छिन्न भिन्न करके तहस-नहस कर दिया कथित पवित्र  किताबों वेद-पुराणों की अवमानना की  मनुस्मृति   जलाई, देवी  देवताओं को गालियाँ  दीं, संतों- महात्माओं पर कीचड़  उछाले, ब्राह्मणवाद की ऐसी -तैसी की, गाँधी जी से भी पंगा लिया, वाइसराय से भी जिद किया, कुछ करना बाक़ी नहीं छोड़ा यहाँ तक कि स्वयं धर्म परिवर्तन कर बौद्ध  भी बन गये । इतना सब कुछ करने के बाद, अभी  थोड़ा सा ही  हासिल कर  सके  हैं। आज भी जब तब उत्पीड़न के शिकार होते ही रहते हैं, और उनका  यह संघर्ष अभी भी जारी है।
      इसके ठीक विपरीत मुसलमान भाइयों  ने क्या किया। मुसलिम वर्ग इस्लाम  से चिपके रहे, उसके वफादार बने रहे, उसका गुणगान करते रहे, रोजे नमाज़ के पाबंद रहे ,मजारों पर चादरें चढ़ाते रहे। कोई परेशानी नहीं है ? इस्लाम  तो एक पूरी सामाजिक व्यवस्था है, इसमे गरीबों और मजलूमों का भी  इंतजाम है। दान और ज़कात की व्यवस्था है, यह इसीलिये की गयी, जिससे गरीबों, मजलूमों का भरण-पोषण हो सके और वे इस धर्म को छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाने न लगें  इस कथन में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि इनकी इसी  व्यवस्थाओं के कारण आज तक कोई  भी एक ऐसा उदहारण नहीं है कि इस्लाम या ईसाई अपने धर्म से निकलकर किसी  दूसरे धर्म को अपनाया । यह तो  केवल एकमात्र  हिन्दू धर्म ही है, जिससे  बहुत सारे लोग निकल कर इस्लाम या  ईसाई धर्म को अपना लेते हैं और समता, बराबरी,  भाईचारा, मानवाधिकार, स्त्री अधिकार और न जाने क्या-क्या स्वर्ग का सब्जबाग देख इससे निकलकर इन मजहबों की गोदें भरते रहे। ज़ाहिर सी बात  है कि उन्हें हिन्दू धर्म में परेशानी थीयह भी सच है कि उन मजहबों के गुण अब भी उसी प्रकार गाये जाते हैं कहीं कोई  क्षोभ, पश्चाताप या पुनरीक्षण नहीं। वे अब भी वैसे ही समतावादी, मानवतावादी होने के लिए ख्याति प्राप्त करने की होड़ में लगें  हैं। इसे  सबसे उचित और श्रेष्ठ सिद्ध करने में लादेन की अलक़ायदा से लेकर डाक्टर  जाकिर नाइक व एक छोटे से छोटे गाँव का गरीब से गरीब  मोलवी-मौलाना  तक लगा हुआ  है। उधर सुदूर जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियां भी यही काम कर रही हैं। इनकी वकालत में  भारत के महान  बुद्धिजीवी वर्ग  भी यही कहते हैं कि अताताई हिन्दू धर्म से ये निकल कर  न जायं तो क्या करें ! ज़ाहिर है कि वहाँ  उनको एक  भविष्य दिखाई देता है।
  इस बात से यह बात प्रमाणित हो जाता है और जहाँ तक हमें जानकारी है कि इन मजहबों के इन्ही सदगुणों के कारण किसी भी  ईसाई या मुसलिम मुल्कों में आरक्षण की  कोई मांग या कोई  व्यवस्था सुनाई नहीं देती है सब उनकी सुराज के कारण है,  जो हिन्दू धर्म में नहीं हैऔर यह हिन्दू  धर्म केवल हिंदुस्तान में ही है।
      ऐसी दशा  में प्यारे  गरीब  ईसाई - मुस्लिम भाइयों से यह पूछना है  कि वे हिन्दू धर्म की जेहालत - जलालत में क्यों लौटना चाहते हैं ? आरक्षण व्यवस्था उनके अपने दलितों के लिए की  गयी व्यवस्था है। वह भी उनकी गरीबे दूर करने के लिए नहीं, वल्कि उन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए है। गरीबी और गरीबों के लिए तो बी  पी एल कार्ड  है। यदि आप में तनिक भी ईमानदारी है तो उनके हक में आप कृपया छीछा, छीजन न करें। यही न्याय की बात होगी, अन्यथा उन पर  आप से भी अन्याय  होगा वे लोंग तो  पहले से ही दबे हैं।
     निवेदन है कि इन सच्चर रंगनाथ  मिश्र लोगों   पर न जाएँ और अपनी नैतिकता की आवाज़ को सुनेंहिन्दू धर्म की तमाम बुराईयों या अच्छाईयों  में एक यह भी है कि यहाँ एक ईश्वर और एक धर्म सन्देशवाहक नहीं होता है वल्कि तमाम देवताएँ होते हैं। इसी तरह के मनुष्यदेवता ही सच्चर, रंगनाथ  मिश्र जैसे लोग ही हैं। महात्मा गाँधी ने तो अपना जान ही गँवा दिया पड़ोसी मुल्क को कुछ करोड़ रूपये भारत सरकार से दिलवाने के लिए। हिन्दू के दधीच तो आपके लिए अपना  अंग -अंग दान करने के लिए तैयार हो जायेंगेपरन्तु उसे लेना  क्या उनके लिए उचित और शोभनीय होगा?
     इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि देश  का साधारण आदमी देवता नहीं हो सकता वह एक सामाजिक प्राणी हैसेकुलरिज्म या धर्म निरपेक्षता का एक अर्थ पारलौकिकता के अलावा इहलौकिकता  भी है। अब जनता अपने महात्माओं के विपरीत धर्मों की साजिशें और उनकी राजनीतिक रणनीतियां भी बखूबी समझती है  अब भारतीय लोगों को मूर्ख बनाना इतना आसान नही रह गया हैजनता ने देख लिया कि इसी आयोग के एक सदस्य ने दलित व अन्य धार्मिक समुदायों  के लिए आरक्षण के विरुद्ध ही आख्या दे डाला और वह सर्वसम्मत भी नहीं है। हिन्दू दलितों की स्थिति में अन्तर को  यहाँ रेखांकित किया गया है। आरक्षण के समर्थक  कोई भी यह बताये कि मोहम्मद  साहेब के  कार्टून के विरोध में लाखों की संख्या में गरीब मुसलमान लखनऊ और अन्य जगहों पर निकल कर आये , क्या इतने ही संख्या में लोग  अपने गरीबी के विरोध में सामने आये  हैं ? इस्लाम में जो लोग दलितावस्था को  झेल रहे हैं क्या उनमें से कोई इसके लिए सामने आये या कुछ कर रहे हैंतसलीमा नसरीन को वीजा मुसलमानों के भय से नहीं दिया जा रहा है , और भारत में इस्लाम की ताक़त उन्हीं के गरीब मुसलमान वर्ग ही है, न की सारे अमीर लोगइसीलिये , गौर से देखें , सारे अमीर उन्हे आरक्षण दिलाने के लिए ऐंडी चोटी एक कर रहे हैं, परन्तु अब यह नहीं हो सकता है, कि जब समता का मज़ा लेना हो तो ईसाई बन जांयें , इस्लाम ग्रहण कर लें , जब आर्थिक सुविधा लेनी हो तो जय श्री राम का नारा लगायेंयदि लेंना ही है तो हिन्दू धर्म के दोज़ख और नर्क में आइये,  यहीं से गए थे तो अब क्यों पड़े हैं  उस जन्नत में ! वरना तो यदि सेकुलर देश में आप तसलीमा को वीजा नहीं देने देंगे , तो हिन्दू देश भी आपको कोई आरक्षण देने में असमर्थ है। कृपया क्षमा करें।   
                    

                    
      -- जी0 के0 चक्रवर्ती (INDIA INSIDE)  

Saturday, December 4, 2010

Culture to the funeral.

Culture to the funeral.
Date :- 4th December 2010
Culture the oldest in our country's culture is one of the world. In Hindu’s culture when a man dies, his dead body is lit up, that Muslims, Christians are Burial to dead body. In many communities there in the flow water is given after death. The primary objective of these actions is the same, and its basis and reasons behind science. It all know that our body is essentially made up of five elements. Tulsi Das Ji wrote in his Chaupai: - Chiti, Jal, Pawak, Gagan, Samira!! Pach tataw Prabhu Racit Adham Sarira !! 1 - Chiti. (Land or Soil ) 2 - Jal. (Water is in the blood.) 3 - Pawak. (Air (air) is in the stomach.) 4 - Gagan. (The sky is in the heart.) 5 - fire ( gall is fire.) these elements are also present in a humans body. These five elements have a one Particular place. Body of man who has five elements, (that's why when someone's death, saying the people where you will hear that a certain person did, oh brother, he disappeared in the five elements.) Are the same elements in the earth. Arising from the soil of all our grain, greens, all elements are present in vegetables. Iron, calcium and other minerals in water too. The element iron in water, please have an important role in a human body. Three gm’s iron in human body Services. If it is out of three gm’s Iron from body the man will die. Similarly, other elements of its - their roles are. A dead body bury the reason is that these elements be created in the space that we combine these elements again. Burn is because all elements of the body changes in gas burning in the fire, the laws of science so that gas is lighter than air and air board runs up in the clouds get in the spreads low temperatures in the earth as rain falls. Mineral salts dissolved in rain water to irrigate food to. Earth like rain water and trees and plants again received this elements. Dead body in the water flow is the when all elements dissolve in water in the rough as all these elements come back in human body. This type of cycle is nature and human life, Creature is very close relation with nature. Man is born on this earth. All the resources of this earth is use, then a man differently from another where, inter habit only human and is in thinking. Every man's the same color of blood and a bone - meat is body. But everyone's different - are distinguished. Action today is the present, in past battles are not even there. May not even be in the future.

Thursday, December 2, 2010

Corruption of the corrupt


Corruption of the corrupt
Date :- 2nd December 2010
Are constantly on scandal do not need to say much. Let everyone know about this, but people say that when higher post to corruption, only that all the people in power positions can not rule on the finger up to the natural. But it's not required all men are like that. Many examples of corruption in our society, a flow is not corrupt, who are educated, some Compelled, rite used and the reasons become corrupted, or are given to make. But people sitting on the higher rungs corruption are two of reasons, such a so tempted to maintain the other his social status dignity to meet the need to do so. Small corrupt man short - is little corruption, but police caught up tortured   and a few days in jail . Millions of Coins corruption or whether the money, corrupt the called, the only difference is that in these two big guys, big corrupt little corrupt the little corrupt. Your access and large corrupt hold on the strength of Wealth not come in now and occasionally still are captured, then add break to get away with. If society would do well ideals the country's general public for all to be legitimate. Murder of law and the rules will be perfect again. What rules, laws and Ideal just sitting on the lower running board man for? Yet many corruption has come front and probably one of many found to be not revealed. Now turn the attention of a huge event that all people should be removed from the issue of corruption.

Sunday, November 14, 2010

चैतन्यता

चैतन्यता
दिनांक – 13/11/2010
संसार मे मनुष्य की दो प्रकार की अवस्थाएँ होती एक चेतन अवस्था ( होश ) और दुसरा अचेतन ( वेहोश ) अवस्था। हमारे मन की जागृतावस्था चेतन कहलाती है। इसमे तीन तथ्यों का होना माना जाता है। 1- वस्तु। 2- दर्शक। 3- देख कर समझने का माध्यम इन्द्रियाँ वस्तु और उसे देखने के बीच के संम्बन्ध का आधार हमारी झानेन्द्रियाँ होती है, जिनसे हम उस वस्तु के रुप ,गंन्ध, स्पर्श से अनुभव करते हैं। किसी विषय या वस्तु के प्रति हमारी जागरुकता तभी संम्भव होती है,जब हम उसकी ओर ध्यान देते हैं। ध्यान के अभाव मे वस्तु, विषय या ध्वनियो को हमारी चेतना स्पर्श नहीं करती है। बच्चपन मे जिन वस्तुओँ से हमे लगाव होता है वह हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाता है। वाल्यावस्था को पर कर लेने के बाद उन विषय वस्तुओं से हमारा संम्बन्ध खत्म हो जाता है। और ये सब विषय वस्तुएँ हमारे अचेतन मे चली जाती है। बच्चपन मे जिस तरह का व्यक्तित्व विकास होता है,ठीक उसी तरह अचेतन से चेतना का विकास होता है। और चेतना पूर्ण विकसीत हो जाने पर हम अपने आप को एक दुसरे से अलग समझने लगते हैं।
मनुष्य व्यक्तित्व मे चेतना का विकास तिन स्तरो मे होता है। 1- इड 2- अहम ( Ego )। सामाजिक अहम ( super Ego या social Ego ) ।
इड - इड मनुष्य के चेतना की वह अवस्था है,जो मनुष्य के जन्म से उसके साथ होता है,जैसे लिंग भेद का झान, धर्म,वासनाएँ, रंग को अनुभव करना,सुख और कष्ट का झान होना। ये सभी इड को चेतनता के मार्ग पर धिरे-धिरे आगे ले जाती है।
अहम – इड अवस्था से बाहर चेतनता का पूर्ण विकसित रुप ही अहम है।
सामाजिक अहम – पूर्ण विकसित चेतना का सामाजिक परिपक्व रुप ही सुपर ईगो है।
मनुष्य अपनी अतृप्त भावनाओं को यथार्थ रुप मे लाना चाहता है। इस अतृप्त भावनाओ का रुप माध्यम अलग-अलग होता है जैसे- एक चोर चोरी करके। एक डाकू डाका डाल कर । एक संगीतझ्य संगीत से । एक कलाकार अपनी कलाकृती से, व्यक्ति के मानसिक जीवन का चेतन एवं अचेतन अवस्था उसके कर्म से व्यक्त होता है। मनुष्य मे वाल्यावस्था से ही यौन चेतना मौजूद रहती है। यौन-चेतना का कुण्ठा का आधार सौन्दर्य वोध के एक पक्ष को जन्म देता है। हमारे समाजए मे सामाजिकता के अनुसार यही काम तृप्ति विवाह के वाद नैतिक एवं विवाह से पूर्व अनैतिक हो जाता है। महान मनोवैझानिक प्लेटो के अनुसार काम जीवन की मूल प्रेरणा है, और यह प्रेम एवं सौन्दर्य के प्रति आकर्षण के रुप मे प्रकट होता है। महान मनोवैझानिक युंग का कहना है कि काम जिवन मे आत्मा के चरम सुख को अनुभव करने का स्थान है,और यही से नये जिवन की उत्पत्ती है।

Friday, November 12, 2010

मानव समज और संस्कृति का विकास ।
संक्षिप्त परिचय
भाग- 1

                        
दिनांक – 1.11.2010
भारतीय समाज की संस्कृति विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति है। मानव संस्कृति का प्रारंभ करोड़ो बर्ष पहले हिमालय के गोद मे शुरु हुआ। स्वर्ग का क्षेत्र हिमालय पर्वत था। जाहाँ मानव की उत्पत्ती हुई । जैसा की हमारे वेद पुराणों मे लिखा है, ईश्वर या सर्वशक्तिमान ने सर्वप्रथम एक पुरुष, स्त्री को जन्म दिया। ( यह जोड़ा शंकर और पार्वती) इस जोड़े से दो पुत्र उत्पन्न हुए एक सूर और दुसरा असूर कहलाया। यह सूर,असूर दोनो भाई के वंश धिरे-धिरे बड़ते रहे। सूर सभाव से बड़े ही सौम्य, मन्नशिल, प्रतिभाशालि और उनका आहार सात्विक था। दूसरा पुत्र असूर का स्भाव क्रोधी, उदंन्ड एवं उनका खान-पान मांस, तामसिक भोजन प्रिय थे। कुछ समय पश्चात दोनो भाईयों मे लड़ाई होने लगी। यह लड़ईयाँ युध्द मे परिवर्ती होता गया। एक समय ऐसा आया असूर लोग स्वर्ग मे अत्यन्त उत्याचार करने लगे उनसे स्वर्ग की संस्कृति को खतरा पैदा हो गया तब उनके पर दादा ने देव आदि देव (शिव जी) दोनो भाईयो को अलग करने के लिये यह आदेश दिया कि बड़े भाई सूर और उनकी संन्ताने यही स्वर्ग मे रहेगें और असूर एवं उनकी संन्ताने वलूच्य देश (आज कल इसका नाम बलूचिस्तान है।) मे जा के रहे। इस प्रकार दोनो दूर रहेंगे तो उनके मध्य युध्द होने का खतरा नही होगा। (चूंकि शिव दोनो ही भाईयों के पूज्यनिय थे। इस लिए आज भी मक्का मदिना मे शिव लिंग का होना बताया जाता है।) 
याहाँ इस आदि काल का एक युध्द संक्षेप मे इस प्रकार है । इस काल के विख्यात असूर महिषासूर ने स्वर्ग मे बहुत उत्पात मचा रखा था । इस असूर को युध्द मे मारना अकेले किसी देवता के वश मे नही था। सभी देवताओ ने मिल कर इसका उपाय सोचा कि हम सारे देवता मिल कर उस असूर का बध करें। परन्तु यह एक निकृष्ट कार्य होगा। और यह युद्ध के नियम के विपरित भी यह विचार कर सभी देवता एकत्रित हो इस समस्या का हल ढूँढने के लिए देव आदि देव शंकर के पास गये। सभी देव मिल कर शिव से बोले कि आप ही अकेले ही महिषासूर (महिष का अर्थ भैंस है, महिषासूर चूंकि भैसे कि सवारी करता था इसलिए उसका नाम महिषासूर पड़ा।) का संहार कर सकते हैं। शिव वोले- मै आप के समाज का प्रथम पुरुष सभी मेरे लिए समान हैं। महिषासूर से युध्द करते समय क्रोध वश मैने आपने पशुपति अस्त्र का (आज वर्तमान समय के दो परमाणु बम पुरी दुनिया को समाप्त कर सकता है, शिव का एक पशुपति अस्त्र पुरी दुनियाँ को नष्ट कर सकता था।) प्रयोग कर दिया तो संसार की सम्पुर्ण  सृष्टी का विनाश हो जायेगा इसलिए यह काम मै नही कर सकता, कोई दूसरा ऊपाय सोचों। सभी देवता ने इस समस्या को हल करने का भार शिव पर ही छोड़ दिया। तब शिव ने यह युक्ति निकाला कि हम सभी का तेज, प्रताप और अस्त्र से लैस एक प्रति मूर्ती बनाकर ही इस असूर का संहार किया जा सकता है। युध्द करने के लिए किसी को विना कारण ललकारा नही जाता है। इसलिए इस प्रति मूर्ती (दुर्गा) को नारी का रुप दिया गया। क्योकि शुरु से ही नारी रुप पुरुष के लिए आर्कषण का केन्द्र रहा यह पुरुष का प्रारभ्य प्रकृति की ही देन है। दुर्गा श्रगांर करके हिमालय के गुफा कंद्राओ के पास जाकर बैठ गई। जहाँ महीषासूर दुर्गा के रुप यौवन पर मुग्ध हो कर उसकी ओर आक्रर्षित हो दुर्गा के पास गया और फिर दोनो मे घमासान युध्द शुरु हुआ। युध्द करते-करते सात दिन गुजर गये। भुखी-प्यासी दुर्गा अपना होश-हवास खो बैठी शरिर काली पड़ गई।  ( इसीलिए दुर्गा का एक रुप काली एवं दूसरा नाम श्यामा है।) और रोद्र रुप मे रण चड़ी बन नरो के सर काट कर खून से अपना प्यास बुझाने लगी दुर्गा का यह उन्मादि रुप देख सब देव घबारा कर फिर से शंकर के पास पहुचें और उनसे देवी को रोकने के लिए प्रर्थना करने लगे। तब शिव जी युध्द क्षेत्र के भूमि पर लेट गये दुर्गा लड़ते-लड़ते अचानक लाश समझ कर अपना एक पैर शिव पर रख दिया अपराध बोध होने पर लज्जा के कारण उनके मुँह से जिभ बाहर निकल आया। इसीलिए काली मुर्ती मे काली की जिभ बाहर निकली हुई होती है। इस युध्द मे महिषासूर मारा गया। एक मर्द कि तरह महिषासूर से लड़ने के कारण दुर्गा का एक नाम महीषासूरमर्दिनी पड़ा । ( दुर्गा की प्रतिमा मे दुर्गा के पैरो तले भैंस और असूर की मुर्ती को प्रदर्शित किया जाता है।) आज भी पहाड़  एवं अन्य समुदायो के लोग शक्ति के उपासक दुर्गा की पूजा करते हैं।      
स्वर्ग मे सूरो के संन्तने धिरे-धिरे बड़ते रहे उधर असूरों के । स्वर्ग में सूरो की संख्या अधिक  हो जाने पर वहाँ  नियम-कानून बनाया गया । देवताओं मे से जो भी स्वर्ग का नियम तोड़ता, उसे दंड स्वरुप नर्क मे जा कर निवास करने का आदेश दिया जाता । नर्क का क्षेत्र (नर के न रह पाने वाला जगह) का निर्धारण ऊपर से सुदूर निचे की ओर अर्थात जाहाँ (हिमालय) से गंगा निलकर समतल पर बहती हो। (जहाँ खाने पिने से लेकर जिन्दा रहने के लिए पल-पल संघर्ष करना पड़ता था। जैसे अंग्रेजी शासन काल का काला-पानी) पहाड़ के निवासी आज भी उपर या निचे को जा रहे हैं शब्दो का प्रयोग करते हैं। स्वर्ग से निकाले गये यह देव और देवी दंड स्वरुप नर्क के निवासी बने और धिरे-धिरे नर्क मे देव और देवीयो के संन्तानो का विकास होता गया। उसी काल मे स्वर्गं निवासीयो का दुसरा वर्ग किन्नरियों, नृत्क,नृर्तकिओ का था। उन्हे हिमालय का दूसरा क्षेत्र ( वर्तमान मे हिमांचल प्रदेश )  मे रहने को दिया गया । (बहुत बर्षो तक इस जगह का नाम किन्नरियो का निवास स्थान होने के कारण किन्नर देश के नाम से जाना जाता रहा। वर्तमान मे इसका नाम बदल कर हिमांचल प्रदेश के किनोर जिला हो गया है।) इस प्रकार स्वर्ग समाज को व्यवस्थित किया गया। धिरे-धिरे दंड पाये स्वर्ग के देव लोगों ने मनुष्यों के रहने के लिए नरक को भी स्वर्ग जैसा बना दिया। इस काल मे मानव अपने जप-तप के वल पर साधु-संन्त ऋषि मुनी बने उन्होने देव आज्ञा से वेद-पुरोणो की रचना की इस समय का मानव अपने पूर्वजो देवो के साथ सिधे संम्पर्ख मे रहें।  धिरे-धिरे यह वंश बड़ता रहा । इस प्रकार देव समाज का फैलाव हुआ। यह देव समाज हिमालय एवं पृथ्वी से कब समाप्त हुए यह कहाना कठिन है, परन्तु यह अनुमान लगाया जाता है कि अवश्य ही किसी भंयकर प्राकृतिक प्रलय ने इस उन्नत समाज का विनाश कर दिया होगा। प्रलय के खत्म होने के बाद बचे हुए मनुष्यों ने अपने समाज का फिर से निर्माण किया। आदि काल के अन्तिम चरण पर तक आते-आते मानव जाति छोटे-छोटे समुदाय बनाकर जंगलो मे खर पतवारों से बने घरो मे रहाना सिख गये  थे। इस तरह एक युग खत्म हो दूसरा पहला युग सत्य युग शुरु हुआ। हमारे पूर्वजों ने युगों को चार भागो मे बाँटा। पहला -सत्य युग । ( इस युग मे सब कुछ सत्य था। झूठ का नामोनिशान नही था। यह सत्य युग कहलाया।) दूसरा - त्रेता युग। (मानव जाती का तिसरा पड़ाव यदि प्ररम्भिक काल को जोड़े तो युग पाँच हो जोयेगें 2-सत्य युग 3-त्रेता युग 4-व्दपर युग 5- कली युग)  होने के तिसरा पड़ाव होने के कारण यह त्रेता कहलाया।)  तिसरा - व्दापर युग। (युग के मध्य का समय होने के कारण व्दापर कहलाया।) चौथा - कली युग। ( यह युग इन तिनो युगो से बड़ा एवं अंन्तिम युग है। ) इस प्रकार मानव संस्कृति और समाज का एक युग के समाप्ती पर फिर से नवनिर्माण होता रहा। पहला सत्य युग –इस इस युग मे भी हिरण्य कश्यप  नामक एक परक्रमी दानव पैदा हुआ।   इस दानव ने मानव समाज मे बहुत उतपात रखा था। हिरण्य कश्यप से मानव समाज त्राही- त्राही कर उठी तब पुरा समाज इस राक्षस से मानव जाती के रक्षा के लिए अपने पूर्वज देवो का स्मरण करने लगे उस समय विष्णु प्रहलाद के रुप मे जन्म लेकर हिरण्य कश्यप का वध्द कर मानव समाज को इस राक्षस से मुक्ती दिलाई। पृथ्वी पर अब तक सैकड़ो बार रामायण और महाभारत हो चूके हैं। मानव अपने पूर्वजो से मिली संस्कृति और वस्तुओ को सहेजता चला गया। फिर त्रेता युग मे पुरुषो मे उत्तम (अच्छा) पुरोषोत्तम राम का जन्म फैजाबाद जिले मे अयोधा नगरी मे हुआ जो की आज भी हम सब के सामने मौजूद है। इस युग के बाद व्दापर युग आया इन दोनो कालो के घटनाओ एवं मनुष्य समाज की संस्कृति का विवरण महाभारत मे विस्तार से उल्लेख किया गया है। व्दापर काल के अन्तिम राजा परिक्षित हुए। राजा का असमय मृत्यु हो जाने के करण  उनका पुत्र जन्मेजय राज गद्दी पर बैठा। जन्मेजय का मंदिर पंजाब प्रदेश मे आज भी मौजूद है। व्दापर काल की समाप्ती का हम सबको पता है। वास्तव मे महाभारत और रामायण दोनो ग्रंथो का इतना अधिक प्रचार-प्रसार हुआ कि हमारे समाज के प्रत्येक आदमी के दिलो-दिमाग मे रच बस गया । याहाँ पर इन दोनो पुस्तको का उल्लेख करना मानव संस्कृति के विकास की कहानी का क्रम बनाए रखने के लिए किया गया।
                                                            क्रमश............

Thursday, November 11, 2010

भावनाएँ ।


भावनाएँ
दिनांक- 11-11-2010
सुन्दर या सुन्दरता शब्द सामान्य रुप से व्यक्ति के जिवन के हर पहलू से है। किसी भी मनुष्य का रुप रंग सुन्दर हो सकता लेकिन यह जरुरी नही की उतना ही सुन्दर उसका मन-मसतिष्क हो यह बहुत कठिनाई से प्राप्त होता है। किसी भी अच्छी लगने वाली या तृप्ति प्रदान करने वाली वस्तु को हम सुन्दर शब्द से व्यक्त करते है, सुन्दर,सुन्दरता हमारे मनोभावना के दो पक्ष हैं। लेकिन क्या वास्तव में यह कहना इतना सरल है कि क्या सुन्दर है? तथा उसमें सुन्दरता कहाँ है? सुन्दरता का मूल उद्देश्य हमारे भाव-जगत को सुख और तृप्ति प्रदान करना है, सुन्दरता जीवन की पूर्णता में कल्याण तथा सत्य का उदघाटन करने वाला है और इसी सत्य और शिव का प्रत्यक्ष दर्शन ही सुन्दरता की अनुभूति है। सुन्दरता के प्रति एक भूख भोजन,घर,साज-सज्जा,कपड़े,अलंकार, अर्थात जिवन के प्रत्येक क्षेत्र मे हैं इसकी तृप्ति हमें किसी देश की संस्कृति मे सुन्दरता के रुप मे वहाँ की कला से प्रात्त होती है। प्रकृति के हर क्षेत्र मे सुन्दरता बिखरा पड़ा है। चुम्बकीय आकर्षण की तरह मनुष्य में उसके प्रती आकर्षित होना उसका सभाव है। सही मायने मे सौन्दर्य पर किसी कलाकार अथवा दार्शनिक का ही अधिकार नही है। सौन्दर्य मनुष्य के अन्दर सफूर्ति, गहन वेदना,कल्पना के लिए खुला आकाश और ह्रदय मे एक शान्ति का संचार करता हैं। सौन्दर्य  कलाकार के सृजन एवं दर्शक की अनुभूति से जुड़ा है। विषय और दृष्टिकोण का अन्तर होने पर भी सौन्दर्य बोध दार्शनिक, कलाकार और जन सामान्य के लिए एक समान महत्व रखता है।
सौन्दर्य एक मनोभावना है,जिसे हम अपना दैनिक जिवन मे अपनी इन्दियों द्वरा देख कर ,सुनकर, या छुकर अनुभव करते हैं। आनन्द, सुख ,संतुष्टि एक भौतिक अनुभूति है,परन्तु एक विवेकशिल व्यक्ति इन मानव इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सुख और आनन्द को अवास्तविक मानता हैं। किसी भी वस्तु को हम खा कर, सूंघ कर,छूकर आनन्दित होते हैं और उसका वर्णन करने लगते हैं, परन्तु उसके कारण पर किसी का ध्यान नही जाता हैं। एक माँ अपने बच्चे को बहुत जतन से पालती है, उसके लिए अनेको कष्ट उठाती है, यह सब इसलिए करती है,क्योकि बह उससे प्रेम करती है। एक किसान खेत की निड़ाई-गुड़ाई करता है, खेत मे हल हला चलाता है और अपने शरिर को अनेको कष्ट देता है क्योकि बह उस खेत से प्रेम करता है। बह अपने कष्ट से ज्यदा उससे  उत्पन्न अन्न को महत्व देता है। वस्तु के प्रति प्रेम और शरीर धारी के प्रेम दोनो मे अन्तर होता है। एक स्त्री अपने बच्चे से प्रेम करती है बही स्त्री अपने पती से प्रेम करती है और बही स्त्री अपने नाती पोतों से प्रेम करती है,एक पुत्र अपने पिता से प्रेम करता है। इन सभी से प्रेम की एक निश्चित धरातल और भावनाओं का स्तर अलग-अलग होता है। यह अलग बात है कि तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन प्रेम की मूल भूत वास्तविक अवस्था एक ही रहती है। मनुष्य अपने रुचि के अनुसार वस्तु से या शरीर धारी से प्रेम करता है। मनुष्य प्रेम और आनंन्द की अनुभूति अपने जिभ,नाक,कान अथवा आँख से करता है। भोजन के स्वाद मे आनन्द लेते हुए उसके बाद होने वाले परिणाम को न सोच कर बह ज्यदा खा लेता है, इसी तरह सिगरेट पीने वाला व्यक्ति उससे बाद मे होने वाली लुकसान को न देखते हुए भी पीता रहता है, क्योकि इसके पीने से उसे आनन्द मिलता है। ठीक इसी तरह किसी संगीत को सुन या सिनेमा को देख मनुष्य उसकी ओर खिंचा चला जाता है। और उसको देखने य़ा सुनने के लिए उसकी आँख कान प्यासी बन जाती है, और उसका मन अधिर हो उठता है, और मन मृग-तृष्णा की तरह इधर से उधर भागता फिरता है। संसार मे बहुत सी वस्तुएँ ऐसी भी हैं, जिसे देख कर,सुन कर, पा लेने के लिए मनुष्य का मन आकर्षित नही होता है। लेकिन कुछ एक प्राकृतिक  वस्तुएँ मनुष्य को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। किसी फूल की सुगंन्ध , सूर्योदय, चाँदनी, किसी बच्चे का रुप या उसकी शरारतों से आकर्षित हो प्यार से उसे हम गोद मे उठा लेते हैं। हमारी इन्द्रिय को जो वस्तु,गंध,देखना या ध्वनि अच्छी लगती है उसे बार-बार प्राप्त कर लेने,सुनने,खाने,पी लेने या छूलेने का मन करता है। फूल की सुगंध हम बार-बार लेना चाहते हैं बहीं नाली की दुर्गंध से हम अपने नाक पर कपड़ा रख लेते हैं। कोयल की कूक सुनकर मन आनन्दित होता है,लेकिन एक कुत्ते की भौं-भौं और गधे का रेंगना हमे अच्छा नही लगता है। समाज मे अच्छी और बुरी दोनो के होने से ही हमे अच्छी बात का अनुभव होता है। यह मनुष्य मे बोध तत्व के होने का प्रमाण है। इन सब का कारण भाव ही है कि प्रकृति में दिखाई देने वाली सुन्दर-असुन्दर मे से हमारा मन सुन्दर को ग्रहण करना चाहता है। यह प्राकृतिक सौन्दर्य ईश्वर द्वरा की देन है। मनुष्य का प्रकृति से घनिष्ट संम्बन्ध है। मनुष्य का सौन्दर्य भावना बोध इस प्रकृति का ही देन है। इस प्रकृति के समुद्र,नदी,झरने,पहाड़,फूल इत्यादी मनुष्य को जन्म से ही सुख देते हैं। उनके स्पर्श,गती,रुप,रंग हमे अच्छे लगते हैं। प्रकृति खुद अपने आप मे आनन्द नही है अपितु मनुष्य के मन,मसतिष्क एवं आँखों मे होता है। एक फूल है दूसरी उसकी गंन्ध फूल तो भौतिक है, उसकी गंध अमर ब्रह्म है।                   

Wednesday, November 3, 2010

राष्ट्र भाषा एवं संस्कृति की पहचान ।

राष्ट्र भाषा एवं संस्कृति की पहचान
आदरनीय वेद प्रताप वैदिक जी सर्व प्रथम आपको करवद्ध प्रणाम- बात सिर्फ शराब की नही शिर्षक से संपदकीय दिनंक-20 अक्तूबर 2010 पोस्ट समय- 12.30 को प्रकाशित आपका लेख पढ़ा अच्छा लगा। यह बात आम व्यक्ति के लिए शिक्षाप्रद है। लेकिन हमे जिन लोगो तक यह बात पहुँचाना चाहिए शायद वहाँ तक न पहुँचे या उनके कानो में जूँ तक नही रेंगे। बात सिर्फ पैंन्ट-शर्ट,अंग्रेजी शराब तक ही होता, आपको य़ह बताना निर्थक होगा कि जब हमारे देश का संविधान ही अंग्रेजी मे लिखा गया है,तो हमारे शासक वर्ग अंग्रजी भाषा को अपने सर-आँखों पर क्यों नही बैठाते ? अंग्रजी शासन काल मे भारत के लोगों को एक नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक था। इसलिए उस समय हमारे याँहा के लोगो ने अंग्रजी भाषा को सीखा। इस भाषा को सीखने की दूसरी वजह यह भी था, कि किसी सत्ता पर चोट करने या किसी भी देश के आदमी को अच्छी तरह समझने के लिए वहाँ की बोली और भाषा का ज्ञान होना बहुत जरुरी है। देश को आजदी मिलने के बाद वही लोगों ने देश का शासन संभाला और सभी काम-काज अंग्रजी मे ही किया। और अपने घर के बच्चो पर अंग्रजी लिखने-पढ़ने के लिए जोर देते रहे। इस प्रकार फिर से देश की जनता पर अंग्रेजी थोप दी गई। किसी भाषा को जानना कोई गलत बात नही है परन्तु कहना यह है कि जब हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी घोषित हुई,उस समय हमारे निती निर्माताओ ने इंजीनियरिंग, डाँक्टरी, प्रतियोगिताओ एवं अन्य अंग्रेजी मे लिखी हुई किताबो को हिन्दी मे क्यो नही बदल दिया ? इसके पिछे भी कारण रहे होंगे लेकिन यदि ऐसा हुआ होता तो आज हम हिन्दी पढ़ने लिखने और काम करने के लिए वाध्य होते, साथ ही साथ समाज के गरीब,मध्यम और अमीर वर्गो के बीच की खाई को कुछ हद तक पाटने मे कायाब हुए होते। अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी संस्कार हमारे संस्कृती मे गहराई तक अपना पैठ बना चूका है जब तक अंग्रेजी भाषा का प्रचलन बंन्द नही किया जायेगा तब तक सही अर्थो मे हिन्दी भाषा एवं संस्कृति अपनी राष्ट्रीय पहचान नही बना पायेगी।