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Sunday, November 14, 2010

चैतन्यता

चैतन्यता
दिनांक – 13/11/2010
संसार मे मनुष्य की दो प्रकार की अवस्थाएँ होती एक चेतन अवस्था ( होश ) और दुसरा अचेतन ( वेहोश ) अवस्था। हमारे मन की जागृतावस्था चेतन कहलाती है। इसमे तीन तथ्यों का होना माना जाता है। 1- वस्तु। 2- दर्शक। 3- देख कर समझने का माध्यम इन्द्रियाँ वस्तु और उसे देखने के बीच के संम्बन्ध का आधार हमारी झानेन्द्रियाँ होती है, जिनसे हम उस वस्तु के रुप ,गंन्ध, स्पर्श से अनुभव करते हैं। किसी विषय या वस्तु के प्रति हमारी जागरुकता तभी संम्भव होती है,जब हम उसकी ओर ध्यान देते हैं। ध्यान के अभाव मे वस्तु, विषय या ध्वनियो को हमारी चेतना स्पर्श नहीं करती है। बच्चपन मे जिन वस्तुओँ से हमे लगाव होता है वह हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाता है। वाल्यावस्था को पर कर लेने के बाद उन विषय वस्तुओं से हमारा संम्बन्ध खत्म हो जाता है। और ये सब विषय वस्तुएँ हमारे अचेतन मे चली जाती है। बच्चपन मे जिस तरह का व्यक्तित्व विकास होता है,ठीक उसी तरह अचेतन से चेतना का विकास होता है। और चेतना पूर्ण विकसीत हो जाने पर हम अपने आप को एक दुसरे से अलग समझने लगते हैं।
मनुष्य व्यक्तित्व मे चेतना का विकास तिन स्तरो मे होता है। 1- इड 2- अहम ( Ego )। सामाजिक अहम ( super Ego या social Ego ) ।
इड - इड मनुष्य के चेतना की वह अवस्था है,जो मनुष्य के जन्म से उसके साथ होता है,जैसे लिंग भेद का झान, धर्म,वासनाएँ, रंग को अनुभव करना,सुख और कष्ट का झान होना। ये सभी इड को चेतनता के मार्ग पर धिरे-धिरे आगे ले जाती है।
अहम – इड अवस्था से बाहर चेतनता का पूर्ण विकसित रुप ही अहम है।
सामाजिक अहम – पूर्ण विकसित चेतना का सामाजिक परिपक्व रुप ही सुपर ईगो है।
मनुष्य अपनी अतृप्त भावनाओं को यथार्थ रुप मे लाना चाहता है। इस अतृप्त भावनाओ का रुप माध्यम अलग-अलग होता है जैसे- एक चोर चोरी करके। एक डाकू डाका डाल कर । एक संगीतझ्य संगीत से । एक कलाकार अपनी कलाकृती से, व्यक्ति के मानसिक जीवन का चेतन एवं अचेतन अवस्था उसके कर्म से व्यक्त होता है। मनुष्य मे वाल्यावस्था से ही यौन चेतना मौजूद रहती है। यौन-चेतना का कुण्ठा का आधार सौन्दर्य वोध के एक पक्ष को जन्म देता है। हमारे समाजए मे सामाजिकता के अनुसार यही काम तृप्ति विवाह के वाद नैतिक एवं विवाह से पूर्व अनैतिक हो जाता है। महान मनोवैझानिक प्लेटो के अनुसार काम जीवन की मूल प्रेरणा है, और यह प्रेम एवं सौन्दर्य के प्रति आकर्षण के रुप मे प्रकट होता है। महान मनोवैझानिक युंग का कहना है कि काम जिवन मे आत्मा के चरम सुख को अनुभव करने का स्थान है,और यही से नये जिवन की उत्पत्ती है।

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